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Monday, July 3, 2017

गजल : खुशी बाँटने की कला चाहता हूँ

गजल : खुशी  बाँटने की  कला  चाहता हूँ

न पूछें मुझे आप  क्या  चाहता हूँ
खुशी  बाँटने की  कला  चाहता हूँ |

गज़ल यूँ लिखूँ लोग गम भूल जायें
ये समझो सभी का भला चाहता हूँ |

बिना कुछ पिये झूमता ही रहे दिल  
पुन: गीत डम-डम डिगा चाहता हूँ |

न कोला न थम्सप न फैंटा न माज़ा
मृदा का बना  मैं  घड़ा  चाहता हूँ |

न पिज्जा न बर्गर न मैगी न नूडल
स्वदेशी  कलेवा  सदा  चाहता हूँ |

पुरस्कार के सच लगे दण्ड जैसे
इन्हें अब नहीं भोगना चाहता हूँ |

उठा आज डॉलर गिरा क्यों रुपैया
यही  प्रश्न  मैं  पूछना चाहता हूँ |

कहाँ खो गये प्रेम के ढाई आखर
मुझे साथ दो, ढूँढना चाहता हूँ |

हमें आ गया याद गाना पुराना
तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ

अरुण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

4 comments:

  1. पुरस्कार के सच लगे दण्ड जैसे
    इन्हें अब नहीं भोगना चाहता हूँ |. बहुत कुछ समेट लिया इस गज़ल में

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  2. वाह शानदार ग़ज़ल

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (05-07-2017) को "गोल-गोल है दुनिया सारी" (चर्चा अंक-2656) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. स्वदेशी कलेवा सदा चाहता हूँ ...
    वाह ... जानदार ग़ज़ल है अरुण जी ... बहुत बधाई ...

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